संपादकीय · समुदाय, नेतृत्व और बदलती कॉलोनियाँ

आरडब्ल्यूए से आगे

बदलती बस्तियों और पुरानी कॉलोनियों को अब केवल पदाधिकारी नहीं, बल्कि जमीनी, उत्तरदायी और बहुस्तरीय स्थानीय नेतृत्व की आवश्यकता है

आरम्भिक सार: पुरानी कॉलोनियों का स्वरूप बदल चुका है, पर उनकी प्रतिनिधि संरचनाएँ अनेक स्थानों पर अभी भी पुराने ढाँचों में अटकी हुई हैं। प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि आरडब्ल्यूए रहे या न रहे, बल्कि यह है कि क्या वह सचमुच लोगों को जोड़ रही है, समस्याएँ सुलझा रही है और बदलते समय के अनुरूप स्वयं को रूपांतरित कर रही है। आज आवश्यकता एक ऐसे नागरिक ताने-बाने की है जिसमें विरासत का सम्मान भी हो, जमीनी सक्रियता भी, नई पीढ़ी की भागीदारी भी, और मानवीय संवेदना भी।

लेखक: शमशीर राय लूथरा
परिचय-पंक्ति: वरिष्ठ प्रसारक, संपादक, पर्यावरणचिंतक और सामुदायिक जीवन के सक्रिय सहभागी, शमशीर राय लूथरा मीडिया, संस्कृति, प्रकृति और नागरिक उत्तरदायित्व के प्रश्नों पर दीर्घ अनुभव से लिखते हैं।

संस्था की उपस्थिति नहीं, उसके उद्देश्य की परीक्षा

भारत की पुरानी बस्तियों और कॉलोनियों में अब यह प्रश्न गंभीरता से उठाया जाना चाहिए कि निवासी कल्याण संघ का वास्तविक उद्देश्य क्या है। क्या उसका काम लोगों को जोड़ना, स्थानीय समस्याओं का समाधान करना और निवासियों की प्रभावी सामूहिक आवाज़ बनना है, या फिर वह अनेक स्थानों पर केवल गुटबाज़ी, पद-प्रतिस्पर्धा, प्रतीकात्मक चुनाव और आहत अहंकार का मंच बनकर रह गया है। किसी संस्था का केवल बने रहना पर्याप्त नहीं होता। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने समुदाय के लिए कितनी उपयोगी, उत्तरदायी और प्रभावकारी है।

किसी संस्था का मूल्य उसके नाम, संख्या या शोर से नहीं, उसके लोकहितकारी परिणामों से तय होता है।

पुरानी मर्यादा का मान, पर परिवर्तन से भय नहीं

कभी मोहल्लों की संस्कृति में भाषा की शालीनता, संबंधों की आत्मीयता और संवाद की गरिमा हुआ करती थी। उसी ने कई कॉलोनियों को केवल संपत्ति के कारण नहीं, बल्कि अपने नागरिक संस्कारों के कारण भी विशिष्ट बनाया। मैं यह बात अपने स्वर्गीय पिता श्री जे. आर. लूथरा के पुत्र के रूप में भी कहता हूँ, जो ग्रेटर कैलाश के एस ब्लॉक की नागरिक चेतना से गहराई से जुड़े रहे। मेरे स्वर्गीय माता-पिता उस पुराने संयम, गरिमा और पड़ोसधर्म के वाहक थे, जिसमें पुलिस, नगर निगम और प्रशासन से भी व्यक्तिगत ऊष्मा और सम्मान के साथ संवाद किया जाता था।

वह समय केवल कम शोर का समय नहीं था, बल्कि अधिक सलीके, अधिक सामाजिक विश्वास और अधिक नैतिक उपस्थिति का समय था। स्थानीय विषयों को बिना अपमान, बिना सार्वजनिक चीख-पुकार और बिना सामुदायिक कटुता के भी आगे बढ़ाया जा सकता था। उस संस्कृति का सम्मान आवश्यक है, किन्तु उसका अर्थ यह नहीं कि आज की चुनौतियों को भी उसी पुराने ढंग से संभाला जा सकता है।

विरासत तभी सार्थक है जब वह भविष्य का मार्ग रोके नहीं, बल्कि उसे अधिक गरिमा और विवेक के साथ खोल दे।

बदलती कॉलोनी की नई माँगें

आज की कॉलोनी तीस-चालीस वर्ष पहले वाली नहीं रह गई। बिल्डर फ़्लोरों ने घनत्व बदला है, नए अपार्टमेंटों ने नई अपेक्षाएँ पैदा की हैं, और नए निवासी भारी मूल्य देकर उन स्थानों में रह रहे हैं जिनकी तुलना अब आधुनिक ऊँची इमारतों और व्यवस्थित बस्तियों से की जाती है। सुरक्षा, पार्किंग, जल-निकासी, बिल-विवाद, निर्माण-अनुशासन, पर्यावरणीय संतुलन और रोज़मर्रा का समन्वय अब कहीं अधिक जटिल विषय हैं। ऐसे में केवल पुराने नाम, पुराने परिचय या पुराने ढर्रे पर्याप्त नहीं रह जाते।

प्रश्न सदस्यता-राशि का नहीं, कार्यक्षमता का है

किसी भी आरडब्ल्यूए का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसके कितने सदस्य हैं, वह कितनी सदस्यता-राशि लेती है, कितनी छूट देती है, या कितने संदेश और पोस्टर प्रसारित करती है। मूल प्रश्न यह है कि वह नगर निगम, विधायक, पार्षद, पुलिस, जल बोर्ड और शासकीय तंत्र से वास्तव में कितना कार्य करवा सकती है। और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आवश्यकता पड़ने पर उसमें से कौन लोग घर से बाहर निकलेंगे, अपना अहंकार अलग रखेंगे और नागरिक उत्तरदायित्व निभाने के लिए सड़क पर उतरेंगे।

स्थानीय नेतृत्व की असली पहचान तब होती है, जब समस्या सामने हो और कोई व्यक्ति सचमुच खड़ा दिखाई दे।

सभ्यता की पहली इकाई कोई समिति नहीं, मनुष्यता है

यह मान लेना भी उचित नहीं कि लोग केवल इसलिए एक-दूसरे की सहायता करते हैं क्योंकि वे किसी आरडब्ल्यूए का हिस्सा हैं। यदि कोई वृद्ध नागरिक सड़क पार कर रहा हो, कोई वृक्ष काटा जा रहा हो, कोई चोरी हो रही हो, या कोई पथ-प्राणी भूख और उपेक्षा से तड़प रहा हो, तो क्या पहले सदस्यता देखी जाती है। नहीं। सभ्यता की पहली इकाई कोई संस्था नहीं, मानवीय चेतना है। अच्छे मोहल्ले की शुरुआत वहीं से होती है। संस्था उस चेतना को दिशा दे सकती है, उसका विकल्प नहीं बन सकती।

अच्छा पड़ोस पहले मनुष्यता से बनता है, बाद में किसी पद, समिति या उपाधि से।

मोहल्ले की असली परीक्षा उसके घावों से होती है

किसी भी बस्ती की वास्तविक परीक्षा उन संकटों से होती है जो बार-बार सामने आते हैं: वर्षा-जल की नालियों में मल-जल डाला जाना, हरित पट्टियों में दूरसंचार टावर लगाए जाना, गति-अवरोधक न होने से मनुष्यों और पशुओं का दुर्घटनाग्रस्त होना, रात-रात भर निर्माण कार्य चलना, अतिक्रमण, वृक्षों की कटाई, यातायात अव्यवस्था और प्रशासनिक चुप्पी। यह सब केवल शिकायतों की सूची नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व की विश्वसनीयता की परीक्षा है। प्रश्न यह है कि इन विषयों पर कार्यवाही कौन करेगा, अनुगमन कौन करेगा, और उत्तरदायित्व कौन लेगा।

जमीनी उपस्थिति ही सेवा की भाषा है

निवासी यह भलीभाँति देख लेते हैं कि कौन वास्तव में गलियों में उतरकर काम करता है और कौन केवल चर्चा में उपस्थित रहता है। हमारे क्षेत्र में यशवंत पाल जी को लोगों ने जमीनी श्रम करते देखा है, और पंकज वधावन भी बार-बार वहाँ उपस्थित रहे हैं जहाँ वास्तविक सहायता की आवश्यकता थी। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि सेवा नारे, पद या घोषणा से सिद्ध नहीं होती; वह उपस्थिति, धैर्य, अनुगमन और परिणाम से सिद्ध होती है।

सेवा कोई घोषणा नहीं, बल्कि समय पर उपस्थित हो जाने की नैतिक क्षमता है।

निजी अनुभव से उपजा नागरिक दृष्टिकोण

मैं यह बात किसी दूर खड़े निरीक्षक की तरह नहीं कह रहा। इस ब्लॉक से मेरा अट्ठावन वर्षों का जीवंत संबंध रहा है। मैंने पर्यावरण और पारिस्थितिकी में परास्नातक किया है, नाले के पार स्थित हरित पट्टी की वर्षों देखभाल की है, पाँच हज़ार से अधिक पौधों के पोषण में भूमिका निभाई है, और पक्षियों, मोरों, प्रवासी जीवों तथा आवारा पशुओं के लिए उस क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बनाए रखने की दिशा में कार्य किया है। कोविड के समय भी, अपने बचपन के मित्र अमरीश के साथ एक सहयोग समूह बनाकर निवासियों को चिकित्सकों, अस्पतालों, संपर्कों और आपात सहायताओं से जोड़ने का प्रयास किया।

इन अनुभवों ने यह सिखाया कि समुदाय अनेक बार संस्थाओं की पूर्णता से नहीं, बल्कि व्यक्तियों की तत्परता से सुरक्षित रहते हैं। जब औपचारिक ढाँचे शिथिल पड़ते हैं, तब वही लोग आगे आते हैं जिनके भीतर संवेदना, संबंध और उत्तरदायित्व जीवित रहते हैं।

केवल समूह नहीं, सक्रिय व्यक्तियों की मान्यता भी आवश्यक

यहीं यह प्रश्न उठता है कि क्या निवासी केवल समूहों को मत दें, या वे विभिन्न पक्षों के सक्रिय, विश्वसनीय और जमीनी व्यक्तियों का भी समर्थन कर सकें। कोई समूह काग़ज़ पर हो सकता है, पर सेवा अंततः व्यक्ति ही देता है। इसलिए प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल ढाँचे का नहीं, बल्कि विश्वसनीय व्यक्तित्वों की पहचान का भी है।

भविष्य एक व्यापक सामुदायिक ताने-बाने का है

बदलती कॉलोनियों का भविष्य संभवतः केवल एक केंद्रीय संस्था में नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और नागरिक ताने-बाने में है। एक महिला-नेतृत्व वाला संसाधन समूह, एक पर्यावरण-मंच, एक निवासी सहायता-जाल, एक पशु-कल्याण दल, एक संवाद-मंच जो लोगों को शिक्षित करे और विषयों को सामने लाए, तथा ऐसे स्वतंत्र जमीनी नेता जो पद-लालसा के बिना लोगों को जोड़ें, ये सब आज की आवश्यकता हैं। आरडब्ल्यूए की इस दौड़ में कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उन्हीं पहलों की उपेक्षा कर रहे हैं जो कई बार निवासियों की अधिक त्वरित, मानवीय और प्रभावी सहायता करती हैं।

भविष्य संभवतः एकमात्र समिति का नहीं, बल्कि अनेक उत्तरदायी सामुदायिक पहलों के सह-अस्तित्व का है।

नीति-निर्माताओं को भी दिशा बदलनी होगी

यदि स्थानीय प्रशासन को सचमुच सशक्त बनाना है, तो केवल आरडब्ल्यूए पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार और नीति-निर्माताओं को ऐसे जन-प्रेरित मंचों को भी प्रोत्साहित करना होगा, जो कम पदानुक्रमित हों, अधिक मानवीय हों और धरातल पर अधिक सक्रिय हों। बेहतर स्थानीय शासन का अर्थ केवल औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि सक्षम सामुदायिक सहभागिता भी है।

वरिष्ठों का सम्मान रहे, पर नई पीढ़ी को स्थान मिले

वरिष्ठों की भूमिका अमूल्य है, पर भविष्य एक ही पीढ़ी में स्थिर नहीं रह सकता। वरिष्ठ निवासियों को धीरे-धीरे संरक्षक, मार्गदर्शक और नैतिक आधार-स्तंभ की भूमिका में आना चाहिए, जबकि युवा निवासी, नए स्वामी और अगली पीढ़ी के स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय उत्तरदायित्व मिलना चाहिए। अनुभव और ऊर्जा का मेल ही किसी कॉलोनी को आगे बढ़ाता है।

जहाँ स्मृति और नवचेतना साथ चलती हैं, वहीं समुदाय भविष्य की ओर बढ़ता है।

समापन

अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमें आरडब्ल्यूए चाहिए या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमें केवल पदाधिकारी चाहिए या जमीनी नेतृत्व। हमें ऐसी संरचनाएँ चाहिए जो लोगों को जोड़ें, समस्याओं का समाधान करें, नई पीढ़ी को स्थान दें, और मानवीय चेतना को संस्थागत शक्ति में बदलें। अंततः कसौटी वही रहेगी: कौन अधिक बोलता है, यह नहीं; किसका कार्य उसकी ओर से बोलता है, यही अधिक महत्वपूर्ण है।

बॉक्स-कोट

किसी भी मोहल्ले की साख केवल उसकी इमारतों से नहीं बनती। वह उसके व्यवहार, उसकी जवाबदेही, उसकी हरित चेतना और उसके लोगों की आपसी मदद से बनती है।

लेखक परिचय

शमशीर राय लूथरा

वरिष्ठ प्रसारक, संपादक, पर्यावरणचिंतक और सामुदायिक जीवन के सक्रिय सहभागी, शमशीर राय लूथरा मीडिया, संस्कृति, प्रकृति और नागरिक उत्तरदायित्व के प्रश्नों पर दीर्घ अनुभव से लिखते हैं। उनका कार्य संवाद, संवेदना और सामाजिक चेतना को जोड़ने का सतत प्रयास है।